Khudiram Bose – Life Story

Khudiram Bose एक ऐसे स्वतंत्रता सेनानी थे जिनका नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा गया है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अनेकों लोगों ने अपने जीवन का बलिदान दिया, लेकिन खुदीराम बोस उनमें से सबसे कम उम्र के लोगों में से एक थे। जब उनको पहली बार गिरफ्तार किया गया, तब उनकी उम्र मात्र पंद्रह वर्ष की थी।

Khudiram Bose

Khudiram Bose
Khudiram Bose

खुदीराम बोस के जन्म की तारीख – 03 दिसंबर 1889
खुदीराम बोस की मृत्यु (फाँसी) की तारीख – 11 अगस्त 1908

उनकी माँ का नाम लक्ष्मीप्रिया व पिता का नाम त्रैलोक्यनाथ बोस था, जो मिदनापुर(पश्चिम बंगाल) के बहुवैनी गाँव के रहने वाले थे। खुदीराम बोस का जन्म 03 दिसंबर 1889 को हुआ था।

ऐसा कहा जाता है कि उनके माता-पिता ने, अंधविश्वास के कारण, उनको कुछ दाने चावलों के बदले अपनी बेटी अपरूपा को बेच दिया था। मिदनापुर में चावल को ‘खुद’ कहा जाता था, अतः ‘खुद’ के बदले लिए जाने के कारण उनका नाम ‘खुदीराम’ पड़ गया। बाद में उनका पालन पोषण उनकी बहन अपरूपा ने ही किया।

बोस के जीवन पर श्री अरबिंदों और सिस्टर निवेदिता के विचारों का गहरा प्रभाव पड़ा व जिसने उनको स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। इसके पश्चात वे पूरी तरह से भारत कि स्वतंत्रता के लिए प्रतिबद्ध हो गए व स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों में भाग लेने लगे।

मिदनापुर की एक क्रांतिकारी संस्था ‘युगांतर’ से जुड़े होने के कारण उन्होंने अनेक क्रान्तिकार्यों में भाग लिया। युगांतर समिति ने ही कलकत्ता के मजिस्ट्रेट किंग्जफोर्ड को मारने की योजना बनाई क्योंकि किंग्जफोर्ड ने 1905 में, जब लॉर्ड कर्जन के द्वारा बंगाल का विभाजन किया गया था, तब बंगाल के विभाजन का विरोध करने वाले भारतीयों को क्रूर सजाएं दी थीं। इसके अतिरिक्त उसने क्रान्तिकारियों को भी अनेकों कष्ट दिए थे।

किंग्जफोर्ड को मारने का कार्य खुदीराम व उनके एक साथी प्रफुल्लकुमार चाकी को सौंपा गया। खुदीराम के जीवन का यह सबसे महत्वपूर्ण कार्य था जिसने उनको अमर कर दिया। उन दोनों को बम व पिस्टल देकर मुजफ्फरपुर भेजा गया, जहाँ किंग्जफोर्ड रहते थे।

इसके पश्चात दोनों दोस्तों ने किंग्जफोर्ड के बंगले, कार्यालय, बग्घी, घोड़े आदि के बारे में जानकारी प्राप्त करी।

30 अप्रैल 1908 का वह दिन था जब दोनों अपने कार्य को अंजाम देने के लिए किंग्जफोर्ड की गाड़ी का इंतजार कर रहे थे। रात का समय था और बहुत घना अंधेरा था। तभी उन्हें एक बग्घी, जो किंग्जफोर्ड की बग्घी के समान ही दिख रही थी, आती हुई दिखाई दी। खुदीराम ने बग्घी पर निशाना लगाकर बम फेंक दिया। इस बम के विस्फोट की आवाज न केवल पूरे भारत में सुनाई दी बल्कि इसकी आवाज इंग्लैंड, यूरोप में भी गई।

लेकिन यह खुदीराम व सभी क्रातिकारियों का दुर्भाग्य था, कि वह बग्घी किंग्जफोर्ड की न होकर किसी अन्य की थी, जो दिखने में किंग्जफोर्ड की बग्घी के समान ही थी तथा जिसमें ब्रिटिश बैरिस्टर प्रिंगल कैनेडी की बेटी और पत्नी सवार थीं। जिनकी बाद में मृत्यु हो गई और किंग्जफोर्ड बच गए।

बम फेंकने के पश्चात दोनों दोस्त वहाँ से पैदल ही भाग निकले और वैनी रैलवे स्टेशन जाकर ही विश्राम किया। जहाँ पुलिस को उन पर शक हो गया और उनको गिरफ्तार कर लिया गया। 11 अगस्त 1908 को, जब उनकी उम्र केवल 18 साल थी, खुदीराम बोस को फांसी दे गई। जिसे उन्होंने हाथ में भगवतगीता लेकर सहर्ष स्वीकार कर लिया। जबकि उनके दोस्त प्रफुल्ल कुमार चाकी ने पुलिस से अपने आप को घिरा देखकर स्वयं को गोली मारकर अपने जीवन को समाप्त कर दिया। इस प्रकार दोनों दोस्तों ने अपने देश के लिए, इतनी छोटी सी ही उम्र में अपने जीवन को न्योछावर कर दिया।

Khudiram Bose की लोकप्रियता का अनुमान निम्न बातों से लगाया जा सकता है-

बंगाल में आज भी लोक गायक उनके सम्मान में गीत रचते व गाते हैं।

जिस जेल में खुदीराम को फांसी कि सजा दी गई थी उसका नाम बाद में मुजफ्फरपुर जेल से बदल कर ‘Khudiram Bose Memorial Central Jail’ कर दिया गया।

उनके नाम पर आज अनेकों कॉलेज, रेलवे स्टेशन, अस्पताल, स्टेडियम आदि भी हैं जिनमें से कुछ के नाम इस प्रकार हैं – खुदीराम बोस सेंट्रल कॉलेज(कोलकत्ता), शहीद खुदीराम स्टेशन(कोलकत्ता), शहीद खुदीराम बोस अस्पताल(Shahid Khudiram Bose Hospital),  शहीद खुदीराम शिक्षा प्रांगण(कोलकत्ता) जिसे अलीपुर कैंपस भी कहा जाता है, खुदीराम अनुशीलन केंद्र, खुदीराम बोस पूसा रेलवे स्टेशन आदि।

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